नाम में क्या रखा है!

दूध की नहर मुझसे नहीं निकलने वाली
नाम चाहे मेरा फरहाद भी रखा जाए।

-शोएब ग़ाजी

कई वर्ष पहले लिखी मुनव्वर राना की यह शायरी रह-रह कर सोशल मीडिया पर उछाल मारती रहती है। दरअसल आती-जाती सरकारें बढ़ती बेरोज़गारी और खस्ताहाली के मुद्दे को छोड़कर, जो नाम की पीछे पड़ गई हैं। कम समय में सुर्खियां बटोरने के लिए नामकरण करना सत्ता नशीन सरकारों के लिए बहुत मुफीद माना जाता रहा है। हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं है। आपको याद होगा कि यूपीए सरकार के समय में कनाट प्लेस और कनाट सर्कस का नाम बदलकर राजीव चौक और इंदिरा चौक हुआ था। इस बात को एक दशक से भी ज्यादा हो चुका है लेकिन आज भी लोग कनाट प्लेस ही जानते हैं। दिल्ली के रेसकोर्स का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग हुआ। कितनों को याद हुआ होगा? अगर मेट्रो स्टेशन वहां नहीं होता तो ये नाम भी शायद सिर्फ कागजों पर सिमट कर रह जाता।

नामकरण का इतिहास बहुत पुराना है, जिसको लिखने के लिए पैराग्राफ छोटा पड़ जाएगा लेकिन बात खत्म नहीं होगी। खैर, अगर नाम बदल जाने से कांग्रेस को फायदा होना होता तो वो आज हाशिये पर नहीं होती क्योंकि जनता नाम बदलने की इस तुच्छ राजनीत के इतिहास के साथ कई दशक पहले विलियम शेक्सपियर के कहे शब्द 'नाम में क्या रखा है बड़ी शिद्दत से दोहराती रही है।

दरअसल, सब जानते हैं गुलाब का नाम बदल देने से उसकी खुशबू नहीं बदलती लेकिन बहुत से लोगों का यह भी तर्क होता है कि कांग्रेस ने किया तो भाजपा भी क्यों न करें। अगर ऐसा ही है तो सरकारों से मेरा बस एक ही सवाल होगा। क्या सरकार का काम है गलतियां दोहराना या उन गलतियों से सबक लेना। एक शहर का नाम बदलने के लिए लाखों-करोड़ो खर्च होते हैं जो जनता के खून-पसीने की कमाई होती है जिसका कोई हिसाब नहीं होता और पानी की तरह पैसा बहा दिये जाते हैं। नामकरण की यह तुच्छ राजनीत रुकनी चाहिए। अरे बदलना ही है तो शहर का नाम नहीं, शहर की सूरत बदलिये।

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