कुंभ मेले की खास बातें जिन्हे देखकर हैरान हो जाएंगे

नई दिल्ली:कुम्भ पर्व विश्व मे किसी भी धार्मिक प्रयोजन हेतु भक्तों का सबसे बड़ा संग्रहण है। सैंकड़ों की संख्या में लोग इस पावन पर्व में उपस्थित होते हैं। कुम्भ का संस्कृत अर्थ है कलश, ज्योतिष शास्त्र में कुम्भ राशि का भी यही चिह्न है।हिन्दू धर्म में कुम्भ का पर्व हर 12 वर्ष के अंतराल पर चारों में से किसी एक पवित्र नदी के तट पर मनाया जाता है। हरिद्वार में गंगा, उज्जैन में शिप्रा, नासिक में गोदावरी और इलाहाबाद में संगम जहां गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती हैं। कुंभ मेला के आयोजन का भव्‍य इंतजाम किया गया है। प्रशासन काफी मुस्‍तैदी से इसके आयोजन में लगा हुआ है। कुंभ का शाब्दिक अर्थ है होता है कलश और यहां ‘कलश' का संबंध अमृत कलश से है। ऐसी मान्‍यता है कि जब देवासुर संग्राम के बाद दोनों पक्ष समुद्र मंथन को राजी हुए थे तब मंदराचल पर्वत इसके लिए मथनी बना था और नाग वासुकी उसकी नेति। मंथन से चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई थी जिन्हें आपस में बांट लिया गया परन्तु जब धन्वन्तरि ने अमृत कलश देवताओं को दे दिया तो फिर युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई।

बीच में भगवान विष्णु को मोहिनी रूप धारण कर आना पड़ा देव दानव दोनों इस बात से सहमत हो गए कि मोहिनी अमृत-पान कराएगी। अमृत कलश को सुरक्षित देवलोक पहुंचाने का काम इंद्र के पुत्र जयंत को सौंपा गया। चूंकि विष्‍णु की आज्ञा से सूर्य, चन्द्र, शनि एवं बृहस्पति भी अमृत कलश की रक्षा कर रहे थे और विभिन्न राशियों (सिंह, कुम्भ एवं मेष) में विचरण के कारण ये सभी कुंभ पर्व के सूचक बन गए। इस प्रकार ग्रहों एवं राशियों की सहभागिता के कारण कुंभ पर्व ज्योतिष का पर्व भी बन गया।

 

 

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