जन्मदिन विशेष : एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता थे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, जानिए उनके 10 अनमोल विचार

गुरुदेव के नाम से विख्यात रवीन्द्र नाथ टैगोर की आज जयंती हैं. गुरुदेव बहुआयामी प्रतिभा वाली शख़्सियत थे.  वे कवि, साहित्यकार, दार्शनिक, नाटककार, संगीतकार और चित्रकार थे. विश्वविख्यात महाकाव्य गीतांजलि की रचना के लिये उन्हें 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वे पहले भारतीय थे जिन्हें साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार मिला.

कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुआ. उनके पिता का नाम देवेन्द्रनाथ टैगोर और मां का नाम शारदा देवी था. स्कूली शिक्षा सेंट जेवियर स्कूल में पूरी करने के बाद बैरिस्टर बनने के सपने के साथ 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में एक पब्लिक स्कूल में दाख़िला लिया.  उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय से क़ानून की पढ़ाई की लेकिन 1880 में बिना डिग्री लिए भारत वापस लौट आए. 

7 अगस्त 1941 को गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कोलकाता में अंतिम सांस ली. वे मानवता को राष्ट्रवाद से ऊंचे स्थान पर रखते थे. उन्होंने कहा था, जब तक मैं जिंदा हूं मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा.

गांधी जी को दी 'महात्मा' की उपाधि

टैगोर गांधी जी का बहुत सम्मान करते थे. लेकिन वे उनसे राष्ट्रीयता, देशभक्ति, सांस्कृतिक विचारों की अदला बदली, तर्कशक्ति जैसे विषयों पर अलग राय रखते थे.हर विषय में टैगोर का दृष्टिकोण परंपरावादी कम और तर्कसंगत ज़्यादा हुआ करता था, जिसका संबंध विश्व कल्याण से होता था. टैगोर ने ही गांधीजी को महात्मा की उपाधि दी थी.

राष्ट्रगान के रचयिता 

गुरुदेव ने बांग्ला साहित्य के ज़रिये भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई जान डाली. वे एकमात्र कवि हैं जिनकी दो रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान बनीं। भारत का राष्ट्रगान जन-गण-मन और बांग्लादेश का राष्ट्रगान आमार सोनार बांग्ला गुरुदेव की ही रचनाएं हैं. 

ईश्वर और इंसान के बीच मौजूद आदि संबंध उनकी रचनाओं में विभिन्न रूपों में उभर कर आता है. साहित्य की शायद ही ऐसी कोई विधा है, जिनमें उनकी रचना न हो - गान, कविता, उपन्यास, कथा, नाटक, प्रबंध, शिल्पकला, सभी विधाओं में उनकी रचनाएं विश्वविख्यात हैं.

प्रमुख रचनाएं

उनकी रचनाओं में गीतांजली, गीताली, गीतिमाल्य, कथा ओ कहानी, शिशु, शिशु भोलानाथ, कणिका, क्षणिका, खेया आदि प्रमुख हैं.  उन्होंने कई किताबों का अनुवाद अंग्रेज़ी में किया. अंग्रेज़ी अनुवाद के बाद उनकी रचनाएं पूरी दुनिया में फैली और मशहूर हुईं. 

शांति निकेतन की स्थापना

गुरुदेव 1901 में सियालदह छोड़कर शांतिनिकेतन आ गए. प्रकृति की गोद में पेड़ों, बगीचों और एक लाइब्रेरी के साथ टैगोर ने शांतिनिकेतन की स्थापना की.  टैगोर ने यहां विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना की. शांतिनिकेतन में टैगोर ने अपनी कई साहित्यिक कृतियां लिखीं थीं और यहां मौजूद उनका घर ऐतिहासिक महत्व का है.

रविंद्रनाथ टैगोर ने करीब 2,230 गीतों की रचना की. रविंद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है. टैगोर के संगीत को उनके साहित्य से अलग नहीं किया जा सकता. उनकी ज़्यादातर रचनाएं तो अब उनके गीतों में शामिल हो चुकी हैं.

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ठुमरी शैली से प्रभावित ये गीत मानवीय भावनाओं के कई रंग पेश करते हैं. अलग-अलग रागों में गुरुदेव के गीत यह आभास कराते हैं मानो उनकी रचना उस राग विशेष के लिए ही की गई थी.

गुरुदेव के 10 अनमोल विचार

1-मैं सो गया तथा स्वप्न लिया कि जीवन आनंद है. मैं जगा और देखा कि जीवन सेवा है. मैंने कर्म किया और देखा कि सेवा ही आनंद था.

2-तितली मास नहीं पलों की गणना करती है और उसके पास पर्याप्त समय होता है.

3-फूल जो कि अकेला है कांटों से ईर्ष्या ना करे जो कि गिनती में अधिक हैं.

4-प्रेम आधिपत्य का दावा नहीं करता अपितु स्वतंत्रता देता है.

5-मित्रता की गहराई जान-पहचान की लंबाई पर निर्भर नहीं करती. जो मन केवल तर्क से भरा है वो ऐसा चाकू है जो केवल तीखा है. वो उस हाथ को क्षति पहुंचाता है जो उसका उपयोग करता है.

6-तथ्य तो बहुत हैं परन्तु सत्य एक ही है.

7-एक फूल की पत्तियां तोड़ने से तुम उसकी सुंदरता नहीं ले सकते.

8-प्रेम ही एकल यथार्थता है और ये मात्र एक भावना नहीं है. ये परम सत्य है तथा प्रकृति के हृदय में वास करता है.

9-आप समुद्र को लांघ नहीं सकते यदि आप खड़े रहेंगे तथा जल को देखते रहेंगे.

10-आओ प्रार्थना करें संकटों से संरक्षण की नहीं अपितु अभय होने की जब उनका सामना हो.

 

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