हिंदी विरोधी आंदोलन से शुरु हुआ था इस नेता का राजनीतिक सफर, अपनी जिंदगी में नही हारा एक भी चुनाव

  • 3-June-2018, 7:40 PM |
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अच्युत द्विवेदी

आज हम आपको ऐसे राजनेता के बारे में बताने जा रहे हैं जिसने अपनी जिंदगी में कभी भी एक भी चुनाव नही हारा है. उनकी राजनीतिक सफर की शुरुआत महज 14 साल की उम्र में ही हो गई थी. जी हां, आज हम आपको बताने जा रहे हैं तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि की, जो आज अपना 94वां जन्म दिन मना रहे हैं.

एम.करुणानिधी द्रविड़ मुन्नेत्र कजगम यानि डीएमके के प्रमुख भी रह चुके हैं. वे 1969 में डीएमके के संस्थापक सी.एन. अन्नादुरई की मौत के बाद से इसके नेता हैं. करुणानिधि पांच बार (1969–71, 1971–76, 1989–91, 1996–2001 और 2006–2011)  राज्य के मुख्यमंत्री  बने.  उन्होंने अपने 60 साल के राजनीतिक करियर में हर चुनाव में अपनी सीट जीतने का रिकॉर्ड बनाया है.

सन 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तमिलनाडु और पुदुचेरी में डीएमके के नेतृत्व वाली डीपीए (यूपीए और वामपंथी दल) का नेतृत्व किया और लोकसभा की सभी 40 सीटों को जीत लिया. इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में उनके द्वारा जीती गयी सीटों की संख्या को 16 से बढ़कर 18 हो गई. उन्होंने तमिलनाडु और पुदुचेरी में यूपीए का नेतृत्व कर बहुत छोटे गठबंधन के बावजूद 28 सीटों पर विजय प्राप्त की. उनके समर्थक उन्हें कलाईनार(कला का विद्वान) कहकर बुलाते हैं. हिंदी विरोधी आंदोलन से राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाले करुणानिधि तबियत खराब होने की वजह से बीते कुछ समय से  सक्रिय राजनीति से दूर हैं.

एक आंदोलन जिसने पूरे तमिलनाडु को हिलाकर रख दिया था

लगभग 6 दशक पूर्व तमिलनाडु में हुए एक हिंसक विरोध प्रदर्शन ने प्रदेश को हिलाकर रख दिया था. यह विरोध प्रदर्शन हिंदी के खिलाफ था. भारत सरकार ने इसी आंदोलन के बाद अंग्रेज़ी को सहायक भाषा का दर्जा दिया था. तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन की अगुवाई अन्नादुरैई कर रहे थे. इस आंदोलन के समय करुणानिधि महज 14 वर्ष के थे, बावजूद वह इस आंदोलन के आवाज बन चुके थे.

एम.करुणानिधि का जन्म तिरुवरूर के तिरुकुवालाई में तीन जून 1924 को हुआ था. वह इसाई वेल्लालर समुदाय से संबंध रखते है. वे पहली बार कुलाथालाई विधानसभा सीट से 1957 में विधायक बने और उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखे.

करुणानिधि तमिल फिल्म में एक पटकथा लेखक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की. द्रविड़ आंदोलन के दौरान वह समाजवादी विचारों को बढ़ावा देने वाली कहानियां लिखने के लिए मशहूर थे. उन्होंने तमिल सिनेमा जगत के पराशक्ति नामक फिल्म के माध्यम से अपने राजनीतिक विचारों का प्रचार करना शुरू किया. 1950 के दशक में उनके दो नाटकों को प्रतिबंधित कर दिया गया.

डीएमके प्रमुख करुणानिधि पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने. इतना ही नहीं वह जब-जब अपनी सीट से विधानसभा चुनाव लड़े उन्हें कभी हार का मुंह नहीं देखना पड़ा. वह 12 बार विधायक चुने गए. करुणानिधि 1967 में पहली बार तमिलनाडु की सत्ता में आए. उन्हें लोक निर्माण मंत्री बनाया गया था. खराब सेहत के कारण करुणानिधि को तमिलनाडु विधानसभा से छुट्टी मिली हुई है. 2016 में अंतिम बार वह विधानसभा पहुंचे थे. फिलहाल वह तिरुवरूर विधानसभा सीट से विधायक हैं.

साहित्य में योगदान

करुणानिधि का तमिल साहित्य में सराहनीय योगदान रहा है. उन्होंने कई कविताएं, चिट्ठियां, पटकथाएं, उपन्यास, जीवनी, ऐतिहासिक उपन्यास, मंच नाटक, संवाद, गाने इत्यादि लिखे हैं. कन्याकुमारी में करूणानिधि ने तिरुवल्लुवर की एक 133 फुट ऊंची मूर्ति का निर्माण करवाया है जो उस विद्वान के प्रति उनकी भावनाओं का चित्रण करता है.

उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी हैं जिसमें रोमपुरी पांडियन, तनपांडि सिंगम, वेल्लीकिलमई, नेंजुकू नीदि, इनियावई इरुपद, संग तमिल, तिरुक्कुरल उरई, पोन्नर शंकर आदि प्रमुख हैं. उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकों की संख्या 100 से भी अधिक है.

 

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