जन्मदिन विशेष: आरएसएस के संस्थापक डॉ.केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातें

  • 1-April-2018, 9:27 PM |
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आरएसएस के संस्थापक  डॉ॰ केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल 1889 को नागपुर में हुआ था. इनके पिता का नाम पण्डित बलिराम पन्त हेडगेवार तथा माता का नाम रेवतीबाई था. माता-पिता ने पुत्र का नाम केशव रखा. केशव का बड़े लाड़-प्यार से लालन-पालन होता रहा. उनके दो बड़े भाई भी थे, जिनका नाम महादेव और सीताराम था.इनके पिता बलिराम वेद-शास्त्र के विद्वान थे एवं वैदिक कर्मकाण्ड से परिवार का भरण-पोषण चलाते थे. स्वामी दयानन्द सरस्वती के अनुयायी व आर्य समाज में निष्ठा होने के कारण उन्होंने अग्निहोत्र का व्रत लिया हुआ था। परिवार में नित्य वैदिक रीति से सन्ध्या-हवन होता था.

हेडगेवार को लेकर दो अहम सवाल अक्सर सुनने में आते हैं. पहला, स्वतंत्रता की लड़ाई में हेडगेवार की भूमिका क्या थी, और दूसरा यह कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के पीछे हेडगेवार का उद्देश्य क्या था? इन सवालों की सतह पर जमी धूल हटाने पर तमाम ऐसे तथ्य सामने आते हैं जो डॉ हेडगेवार के बहुआयामी व्यक्तित्व को दिखाते हैं. डॉ हेडगेवार शुरुआती दिनों में बाल गंगाधर तिलक से प्रेरित स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतिबद्ध सेनानी के रूप में नजर आते हैं. हालांकि उनके जीवन से जुड़े इस पक्ष पर खास वैचारिक आग्रह वाले इतिहासकारों ने पूरी ईमानदारी से काम नहीं किया है.

देशभक्ति का भाव और अंग्रेजों के प्रति विद्रोह की मंशा हेडगेवार के मन में बचपन से थी. ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के साठ वर्ष पूरे होने के अवसर पर 22 जून, 1897 को भारत में जश्न मनाने का आदेश हुकूमत द्वारा दिया गया था.

बचपन से देशभक्ति की भावना

आठ वर्ष के बालक केशव बलिराम हेडगेवार के स्कूल में भी मिठाई बंटी. लेकिन बालक केशव मिठाई अस्वीकार करते हुए कहा, 'लेकिन वह हमारी महारानी तो नहीं हैं.' एक और प्रकरण 1901 का है. इंग्लैण्ड के राजा एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण का विरोध करते हुए हेडगेवार ने कहा था, 'विदेशी राजा का राज्यारोहण मनाना हमारे लिए शर्म की बात है.' भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित पुस्तक आधुनिक भारत के निर्माता में लिखा है कि नागपुर के सीताबर्डी किले के ऊपर अंग्रेजी हुकूमत का प्रतीक यूनियन जैक, उन्हें मन ही मन कचोटता था.

1908 में दशहरे के दौरान रामपायली गांव की सीमा के पास वर्षों से चला आ रहा सीमोलंघन का कार्यक्रम आयोजित किया गया था. इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए हेडगेवार ने कहा था कि आज हम अनेक सीमाओं में बंधे हैं. उन्हें पार करना हमारा कर्तव्य है. सबसे बड़ी पीड़ादायक और शर्मनाक बात हमारा परतंत्र होना है. अत: अंग्रेजों को सात समुंदर पार भेज देना ही सही मायने में सीमोलंघन कहा जाएगा.

प्रोफेसर राकेश सिन्हा ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि इस भाषण के बाद वहां वंदेमातरम गूंजने लगा और इसके लिए डॉ हेडगेवार के ऊपर धारा 108 के तहत अंग्रेजी हुकूमत ने 'राजद्रोह' का मुकदमा दर्ज करा दिया. अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह मामले में यह उनकी पहली गिरफ्तारी थी.

जमानत के बाद रामपायली में उनके भाषण पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. बीसवीं शताब्दी का पहला दशक बीतते-बीतते हेडगेवार को अंग्रेजी हुकूमत वाली सरकार अपने लिए खतरा मानने लगी थी. इसका प्रमाण 1914 में तत्कालीन अंग्रेज हुकूमत वाली भारत सरकार के क्रिमिनल इंटेलिजेंस द्वारा भारत के राजनीतिक अपराधियों की एक पुस्तिका से मिलता है. इस सूचि में उन लोगों को शामिल किया गया था जो क्रांतिकारी संगठनों से जुड़े थे और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गर्म विद्रोह को हवा दे रहे थे. इस 'बुक 1914' में हेडगेवार का नाम भी शामिल था.

आरएसएस की स्थापना

डॉ. हेडगेवार ने अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन में अपना लंबा समय दिया था. लेकिन एक सवाल उनके मानस पटल से नहीं जा रहा था कि आखिर हम गुलाम क्यों बने? राकेश सिन्हा ने अपनी पुस्तक आधुनिक भारत के निर्माता मेंके निर्माता में इसका जिक्र किया है. इसी के समाधान के विचार मंथन में उन्होंने वर्ष 1925 के विजयदशमी के दिन 25 लोगों के साथ विचार मंथन करके एक संगठन की बुनियाद रखी. इस संगठन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम 17 अप्रैल, 1926 को मिला. संघ के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा था, 'स्व-प्रेरणा एवं स्वयंस्फूर्ति से राष्ट्रसेवा का बीड़ा उठाने वाले व्यक्तियों का केवल राष्ट्रकार्यार्थ संघ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है.'

1928 में संघ कार्य के लिए धन जुटाने के लिए ध्वज को समर्पित गुरु दक्षिणा कार्यक्रम की शुरुआत उन्होंने की थी, जो आज भी अनवरत जारी है. इस दौरान कुछ लोगों ने डॉ. हेडगेवार की जीवनी लिखने की इच्छा जताई, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि संघ कार्य में व्यक्ति महत्वहीन है और कार्य महत्वपूर्ण. संघ ने अपने स्तर पर स्वतंत्रता की लड़ाई में पूर्ण स्वराज्य की अवधारणा को बल दिया. दिनांक 27-28 अप्रैल, 1929 को 100 स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण शिविर में सार्वजनिक तौर पर घोषणा की गई कि संघ का उद्देश्य स्वतंत्रता को प्राप्त करना है.

डॉ॰ हेडगेवार ने जिस दुखद स्थिति को व्यक्त किया, उसमें नवसर्जित राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और हिंदू महासभा के नेतृत्व के प्रयास से- हिंदू युवाओं में साहस के साथ यह नारा गूंजने लगा “हिन्दुस्थान हिंदुओं का- नहीं किसी के बाप का” इस कथन की विवेचना डॉ॰ हेडगेवार ने इन शब्दों में की:-

“कई सज्जन यह कहते हुए भी नहीं हिचकिचाते की हिन्दुस्थान केवल हिन्दुओ का ही कैसे? यह तो उन सभी लोगों का है जो यहाँ बसते हैं l खेद है की इस प्रकार का कथन/आक्षेप करने वाले सज्जनों को राष्ट्र शब्द का अर्थ ही ज्ञात नहीं. केवल भूमि के किसी टुकड़े को राष्ट्र नहीं कहते.एक विचार-एक आचार-एक सभ्यता एवं परम्परा में जो लोग पुरातन काल से रहते चले आए हैं उन्हीं लोगों की संस्कृति से राष्ट्र बनता है . इस देश को हमारे ही कारण हिन्दुस्थान नाम दिया गया है. दूसरे लोग यदि समोपचार से इस देश में बसना चाहते हैं तो अवश्य बस सकते हैं l हमने उन्हें न कभी मना किया है न करेंगे. किंतु जो हमारे घर अतिथि बन कर आते हैं और हमारे ही गले पर छुरी फेरने पर उतारू हो जाते हैं उनके लिए यहाँ रत्ती भर भी स्थान नहीं मिलेगा. संघ की इस विचारधारा को पहले आप ठीक ठाक समझ लीजिए.”

मृत्यु

ये मृत्युपर्यन्त संघ के सर संघचालक रहे .भारत माता का यह अमर सपूत 21 जून 1940 को इस नश्वर शरीर को छोड़कर चिरनिद्रा में लीन हो गया.

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